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कांग्रेस में बड़े बदलाव की जरूरत

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सलीम रज़ा

अभी हाल ही में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव मे कांग्रेस का जो हश्र हुआ है वो चिन्ता का बिषय जरूर है। भले ही पार्टी के कार्यकर्ता चुनाव में मिली पराजय का ठीकरा एक दूसरे के सिर पर फोड़ कर अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हों लेकिन सच क्या है इसे कबूलने से परहेज क्यों?। भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से प्रदर्शन किया और पाचं राज्यों में से चार राज्यों में विजय पताका फहराई वो अविश्वसनीय है। आपको बता दें कि 2017 के विधान सभा चुनावों में और फिर 2019 के संसदीय चुनाव में भी कांग्रेस धाराशायी हो गई थी लेकिन कांग्रेस ने अपनी रणनीति में कोई खास बदलाव नहीं किया जिसका नतीजा रहा कि 2022 के विधान सभा चुनाव में में भी जीत के लिए तरस गई। अब चूंकि 2024 में संसदीय चुनाव होने हैं ऐसे में कांग्रेस के पास क्या स्टैंड होगा ये देखने वाली बात होगी। अब एक बहुत बड़ा सवाल पैदा होता है कि भाजपा के पास ऐसा क्या नया है जिसने शताब्दी पुरानी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को हाशिये पर धकेल दिया क्या अकुशल नेतृत्व इसके लिए जिम्मेदार र्है? अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो ठीक है लेकिन सबसे बड़ी बात है जिस तरह से संघ और भजपा के वरिष्ठ नेता कांग्रेस पर हमलावर रहे वो विचारधारा की लड़ाई है। ंदरअसल कांग्रेस केी जो विचारधारा थी उससे हटकर कांग्रेस ने काम करना शुरू कर दिया भारतीय जनता पार्टी के अग्रिम पंक्ति के नेताओं को अक्सर वंशवाद,परिवारवाद को लेकर अन्य ििपर्टयों पर हमलावर रहे लेकिन कांग्रेस को दूर रखा आखिर क्यों? इसमें अगर लड़ाई रही तो वो विचारधारा की रही जिससे कांग्रेस दूर हाती जा रही है। अगर हम देखें तो विचारधारा में बदलाव आयरन लेडी इन्दिरा की देन थी जिन्होंने कांग्रेस की विचारधारा को बदलने की शुरूआत करी क्योंकि इन्दिरा गांधी का वो दौर था जिसने मजबूत लोकतांत्रिक प्रक्रिया को खासा नुकसान पहुंचाया था, आपातकाल इसका जीता जागता उदाहरण रहा था। वहीं कांग्रेस अपनी आथर््िाक नीति से दूर हटने लगी और उदारवादी नतियों को अपनाना शुरू कर दिया ये दौर राजीव गांधी का था। दुखद ये रहा कि गांधी जी की विचारधारा को नेहरू ने छोड़ा तो वहीं इन्दिरा और राजीव गांधी ने नेहरू के रस्ते को छोड़ दिया ये वो दौर था जिसके नुकसान की भरपाई आज भी कांग्रेस नहीं कर पा रही है। ये ही वजह थी कि भाजपा ने हर मोड़ हर मामले पर नेहरू पर प्रहार किया लेकिन कांग्रेसी अपनी विचारधारा से अलग ही चलते रहे यही बात रही कि जनसंघर्ष और जनान्दोलनो से कांग्रेस परहेज करती रही। अगर काग्रेस को आगामी संसदीय चुनाव में कुछ कर दिखाना है तो उसे अपनी विचारधारा को बदलना होगा जिससे भाजपा को अपनी रणनीति में बदलाव लाना पड़े अगर ऐसा संभव नहीं हो पाया तो कांग्रेस आने वाले चुनावों में भी खाली हाथ ही रहेगी।

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