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कामन सिविल कोड: धामी सरकार का संकल्प या चुनौती

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सलीम रज़ा /

 

देवभूमि उत्तराखण्ड में धामी सरकार 2 का कार्यकाल शुरू हो चुका है वैसे भी निर्वतमान भाजपा की सरकार में मुद्दों की भरमार थी जिनका निस्तारण भाजपा के तीन-तीन मुख्यमंत्री नहीं कर पाये लेकिन हमारे रिपीट मुखिया पुष्करसिंह धामी ने उन सारे मुद्दों के साथ कामन सिविल कोड लागू करने का का संकल्प लेकर सबको हैरत में डाल दिया ये वो काम था जो आजादी के बाद से आज तक हवा में तैर रहा हैं। ये बात सोलह आने सही हे कि सवस्थ लोकतंत्र और संविधान की गरिमा को बनाये रखने के लिए हमें संविधान में प्रदत्त अधिकारों और कानूनों का पालन करना चाहिए। जहां तक कामन सिविल कोड की बात है तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि मेरी समझ में ये नहीं आ रहा है कि जब संविधान निर्माताओ ने विवाह के लिए एक कानून बनाने की सिफारिश की थी और ये कहा था कि राज्य सरकारें इस तरफ ध्यन दें फिर ये मुद्दा संप्रदायिक कैसे हो गया । उनका कहना था कि जब क्रिमिनल ला एक हो सकता है तो फिर कामन सिविल ला एक क्यों नहीं हो सकता ।

वहीं प्रखर समाजवादी नेता डाक्टर राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि, एक ही बिषय पर हर धर्म के लिए अलग-अलग कानून धर्मनिरपेक्षता,देश की अखंडता और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए ज्यादा खतरनाक है। बहरहाल कामन सिविल कोड लागू करने का जो संकल्प धामी सरकार ने लिया है उसकी राह इतनी आसान नहीं है जितनी बताकर बनाकर पेश कर दी गई है। मेरा ऐसा मानना है कि कामन सिविल कोड को लेकर जो बहस का मुद्दा सामने आने वाला है वो 2024 के संसदीय चुनाव और 2027 के विधान सभा चुनाव के समय को काटने के लिए पर्याप्त है जबकि इसका समाधान और इस कानून कोे लागू करना धामी सरकार के लिए चुनौती बन सकता है। ऐसे में ये एक ऐसा इकलौता कानून होगा जो राज्य के ज्वलंत मुद्दों से ध्यान भटकाने का अचूक अस्त्र होगा। आईये जरा नजर दौड़ा लें कामन सिविल कोड रूपी जिन्न के बारे में जो कई दशकों से बोतल में बंद था अब बाहर आने की तलाश में है। खैर चलिए आगे बढ़ते हैं हमारे देश में लैंगिक असामानता एक ऐसा मर्ज हे जिसका निदान आज तक नहीं हो पाया इसने इंसान की मानसिकता को अपना गुलाम बना लिया है।

लैंगिक असमानता ईश्वर ने नहीं बनाई है उसकी नजर में सब बराबर हैं लेकिन समाज के अन्दर पनप रहे भेदभाव रूपी वायरस को लोगों ने रीत का मनगढ़ंत स्वरूप दे दिया जबकि ये रीत नही बल्कि कुरीति है। हमें किसी भी कुरीति या कुप्रथा को धर्म के चश्में से नहीं देखना चाहिए, हमारा देश धर्म ग्रंथों से नहीं बल्कि संविधान से चलता है संविधान की आत्मा ही समानता,समरसता,सरसता और समान अधिकार में रची बसी है। जबकि हमारे संविधान के आर्टिकल 25 जिसे हम धार्मिक आजादी कहते हैं उसमें किसी भी प्रकार की कुरीति,कुप्रथा और पाखंड को कोई स्थान नहीं है फिर उसकी दुहाई क्यों देना। जहां तक लोग संविधान की दुहाई देते हैं और उस पर अपनी नुक्ता चीनी करने से भी नहीं चूकते लंकिन जब बात कांटे की हो तो ये कहते भी नहीं थकते कि संबिधान का सम्मान हमें सर्वोपरि है, फिर संविधान में दिये गये आर्टिकल 44 पर बहस कैसी या फिर इस पर इतना मंथन क्यों ?

खैर चार दशक बीत जाने और 125 बार संविधान में संशोधन होने के बाद भी इस कानून को लागू करने की सरकार की दृढ़ इच्छा शक्ति नजर नहीं आई जबकि पाच बार उच्चतम न्यायालय का फैसला भी पलटा गया आखिर क्यों ?। ऐसा लगता है कि सरकार ने इसे लागू करने के लिए कभी संजीदगी से सोचा ही नहीं या फिर वोट बेंक के मोह ने इसे ठंडे बस्ते में डालने को मजबूर कर दिया। आी भी ये मसौदा विधि आयोग के पास है लेकिन मसौदा तैयार नहीं हो पाया । आपको बता दें कि आजादी के बाद से ही समान नागरिक संहिता पर बहस जारी है लेकिन अभी भी ये कानून लागू होने के इंतजार मे है। ऐसे में उत्तराखण्ड के सी.एम पुष्कर सिंह धामी ने समान नागरिक सहिता यानि कामन सिविल कोड पर अपना रूख भले ही सपष्ट कर दिया हो लेकिन इसे लोगू करना धामी सरकार के लिए आसान नहीं होगा। अब सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न ये हे कि क्या सरकार के पास इस कानून को लागू करने का अधिकार है ये मुद्दा कोई नया नहीं है ये मुद्दा तो भाजपा का एजेन्डा है जो तकरीबन 3 दशक पहले से ही भाजपा अपने घोषणा पत्र में जाहिर कर चुकी है, लेकिन कानूनी अड़चनों ने भाजपा के हाथ बांध दिये हैं वरना मोदी के प्रधानमंत्री रहने के साथ ही इस पर मुहर लग जाती।

दरअसल भाजपा का मानना है कि लैंगिक समानता तब तक नहीं हो सकती जब तक समान नागरिक संहिता लागू न हो। वहीं विधि जानकारों का मानना है कि देश के संविधान मे कानून बनाने की शक्तियां केन्द्र के साथ राज्य सरकारों के पास हैं लेकिन जब बात पर्सनल ला की आती है तो इस मामले में राज्य सरकार के हाथ में कुछ भी नहीं है यदि देश की कोई भी किसी भी राज्य की सरकार पर्सन ला में संशोधन या समान नागरिक संहिता लागू करने की कोशिश करेगी तो कानून की वैधता के खिलाफ अदालत में उसे चुनौती मिल सकती है फिर धामी सरकार कैसे इतने यकीन के साथ इस कानून को लागू करने का दम भर रही है। ये भी सुना जाता है कि लोग इस बात पर जोर देते हेै कि गोवा में समान नागरिक संहिता लागू है तो जरा इस पर भी नजर दौड़ायें कि गोवा के आस्तित्व में आने के साथ ही पुर्तगाल सिविल कोड 1867 लागू है यानि गोवा में समान नागरिक संहिता भारत में समायोजित होने से पहले से ही थी। ये धर्म से जोड़कर देखा जाने वाला कानून है ऐसा लगता नही है लेकिन इसकी नुक्ताचीनी के लिए धार्मिक दलीलें जरूर सामने आयेंगी। समान नागरिक संहिता पर अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व सदस्य ताहिर महमूद कहते हैं कि परंपरागत कानून के लिए धार्मिक,राजनीतिक दबाव बनाये जाने के वजाए मुसलमानों को समान नागरिक संहिता की मांग करना चाहिए।

बहरहाल समान नागरिक संहिता आज के वक्त की आवाज है और इसे बगैर किसी दुर्भावना और सियासी बाजार को गर्म करने के वजाए संजीदगी और पूरी ईमानदारी के साथ जनभावनाओं को ध्यान में रखकर लागू किया जाना चाहिए। लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या राज्य सरकार के पास अधिकार है कि वो समान नागरिक संहिता लागू कर पाये ये तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन हमें बाबा साहेब डाक्टर भीमराव अंबेडकर की उन बातों को भी स्मरण करना चाहिए जिन्होंने कहा था कि अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग कानून की वजाए भारतीय दंड संहीता की तरह सभी भारतीयों के लिए जाति धर्म भाषा क्षेत्र और लिंग निरपेक्ष एक भारतीय नागरिक संहिता लागू होना चाहिए। अंत में ये ही कहा जा सकता हे कि समान नागरिक संहिता के मामले को पेचीदा न बनाया जाऐ वल्कि सबकी अच्छााईयों को मिलाकर भारतीय नागरिक संहिता का एक ड्राफ्ट तैयार किया जाये और उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए जिससे इस मसौदे पर सार्वजनिक चर्चा हो सके।

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