MID सर्टिफिकेट अनिवार्य करने पर हंगामा, अधिकारियों की भूमिका पर उठे सवाल
उत्तराखंड पेयजल निगम के नए SOR (Schedule of Rates) को लेकर उठा विवाद अब और गहराता नजर आ रहा है। नए नियमों के बाद यह सवाल लगातार तेज हो रहे हैं कि क्या राज्य सरकार इस पूरे मामले में समय रहते हस्तक्षेप करेगी या फिर यह विवाद यूं ही बढ़ता रहेगा। उद्योग जगत और आम जनता दोनों की निगाहें अब सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।
स्थानीय और भारतीय निर्माताओं का कहना है कि नए SOR में किए गए बदलावों से उन्हें योजनाबद्ध तरीके से बाहर करने का प्रयास किया गया है। विशेष रूप से विदेशी मानकों से जुड़े कुछ प्रमाणपत्रों को अनिवार्य किए जाने से घरेलू कंपनियां प्रतिस्पर्धा में पिछड़ती नजर आ रही हैं। ऐसे में यह आशंका जताई जा रही है कि यदि नियमों की समीक्षा नहीं हुई, तो उत्तराखंड में स्थानीय उत्पादन और निवेश को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
निष्पक्ष जांच की उठी मांग
इस पूरे मामले में अब उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है। उद्योग संगठनों और विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि नए SOR में बदलाव तकनीकी आवश्यकता के तहत किए गए या फिर किसी खास वर्ग को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से। यदि जांच में अनियमितताएं सामने आती हैं, तो यह मामला केवल नीतिगत चूक नहीं बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन सकता है।

रोजगार और निवेश पर असर की आशंका
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकारी खरीद प्रक्रियाओं में विदेशी उत्पादों को प्राथमिकता मिलती रही, तो इसका सीधा असर राज्य के रोजगार, निवेश और स्थानीय उद्योगों पर पड़ेगा। स्थानीय इकाइयों के कमजोर होने से न केवल उत्पादन घटेगा, बल्कि राज्य की आर्थिक आत्मनिर्भरता पर भी सवाल खड़े होंगे।
सरकार से कार्रवाई की उम्मीद
अब जनता और उत्तराखंड का स्थानीय उद्योग जगत सरकार से यह उम्मीद कर रहा है कि वह जल्द से जल्द इस मामले में हस्तक्षेप कर नियमों की समीक्षा कराएगी। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाएगा कि स्थानीय और भारतीय निर्माताओं को समान अवसर मिलें और नीतियां ‘मेक इन इंडिया’ व ‘वोकल फॉर लोकल’ की भावना के अनुरूप हों।